पश्चिम ने भोतिक विज्ञान में बहुत तरक्की की इसके पीछे एक ही वजह में मानता हूँ कि विज्ञान कभी किसी को अपने स्थापित मानदंडों के ऊपर संदेह करने पर रोक नहीं लगाता | आज कोई भी वैज्ञानिक न्यूटन के सिद्धांत का खंडन करे तो उसको साम्प्रदायिक कहकर उसका बहिष्कार नहीं किया जायेगा अपितु पूर्ण सम्मान के साथ उसकी बात को सुनकर उस पर अनुसंधान किया जायेगा तथा यदि सही पाया जाए तो पुरानी मान्यताओ को खारिज करके नयी मान्यताओं के साथ नया नियम प्रचलित किया जायेगा | इस क्रियाकलाप को कोई भी वैज्ञानिक न्यूटन के अपमान के रूप में नहीं लेगा | यही विज्ञान के विकसित होने का मूल कारण है |
जिस प्रकार विज्ञान द्वारा अपने ऊपर संदेह करने पर रोक नहीं लगाना ही उसके विकास का कारण है ठीक उसी प्रकार का विकास हमारे हिंदू धर्म का हुआ है | विश्व में यह एक मात्र ऐसा धर्म है जो पूर्णतया वैज्ञानिक व लोकतांत्रिक है | पुराने समय में शास्त्रार्थ करना हमारी बहुत ही सम्रद्ध परम्परा रही है | शास्त्रार्थ में एक पक्ष संदेह करता था या किसी प्रचलित मान्यता की अपने अनुसार व्याख्या करता था तो दूसरा पक्ष किसी ओर तरह से उसकी व्याख्या करता था | दोनों पक्ष शास्त्रार्थ करके अंत में किसी नतीजे पे पहुचते थे तथा एक पक्ष दुसरे पक्ष को अपना गुरु स्वीकार कर लेता था | आदि शंकराचार्य स्वयं इसके प्रमाण है | अन्य कई एतिहासिक ग्रन्थ इन प्रमाणों से भरे हैं | हिंदू धर्म इन्ही शास्त्रार्थों व संदेहों की अग्नि से तपता हुआ विकसित हुआ है | विज्ञान की तरह धर्म का विकास भी एक सतत प्रक्रिया है | परिस्थिति, काल व सामाजिक आवश्यकताओं के अनुरूप इसका स्वरुप वांछित बदलाव लेता है | आजकल इस विकास की प्रक्रिया को इन तथाकथित धार्मिक ठेकेदारों ने विकृत स्वरुप दे दिया है | संदेह का जवाब शास्त्रार्थ के स्थान पर फतवा या व्हिप या सुपारी या धमकियों ने ले लिया है | जो हिंदू धर्म अपनी इस लोकतान्त्रिक परम्परा के कारण अनादि काल से अपने आप को चिर युवा बनाये हुए था वो आज बैसाखियाँ ढूंढ रहा है |
हम सभी जानते हैं कि हिंदू धर्म अनेकों धर्मों का जनक रहा है | इसका कारण ही ये है कि सत्य की खोज की ओर अग्रसित मन को लीक से हट कर विभिन्न प्रयोगों को करने की पूर्ण स्वतंत्रता सिर्फ यही धर्म देता है | अन्य धर्मों में उसके अनुयाइयों को अपने धर्म की प्रचलित मान्यताओं पर संदेह करने तथा नए प्रयोग करने की इजाजत नहीं है | जैसे मुसलमान कुरान पर संदेह नहीं कर सकता, ईसाई बाइबिल पर संदेह नहीं कर सकता, सिख श्री गुरुग्रंथ साहिब को संदेह की द्रष्टि से नहीं देख सकता इत्यादि अनेक उदाहरण हैं | इन सभी धर्मों में एक इश्वर, एक किताब, एक नियम को सख्ती से लागू किया गया है | मेरा मकसद इन महान धर्मो की आलोचना करना कदापि नहीं है | ये सभी धर्म अपनी अपनी प्रतिपादित सीमाओं में बहुत अच्छे व सम्पूर्ण हैं किन्तु मानव मन इन सीमाओं से पार भी देखना चाहता है जिसकी व्यवस्था सिर्फ हिंदू धर्म ही प्रदान करता है | हिंदू धर्म में अनेक इश्वर, अनेकों किताबें, अनेकों धाराएं हैं तथा पूर्ण स्वतन्त्रता है आपको अपने प्रयोग करने की | हिंदू धर्म में मांस खाना वर्जित भी है तथा प्रचलित भी है, मूर्ति पूजा करो या ना करो इससे आपके हिंदू होने के अधिकार को कोई चुनौती नहीं मिलती है | यदि आप गीता में लिखित किसी बात को मानने से इनकार कर दो या उसका विरोध कर दो तो कोई आपको तनखैया घोषित नहीं कर सकता या आप पर फतवा जारी नहीं कर सकता | आप मंदिर जाओ या ना जाओ यह आपकी मर्जी है | ३३ करोड देवी देवता हैं जिनमे से आप अपनी पसंद से चुन सकते हो या नया उत्पन्न कर सकते हो | गीता, वेद, पुराण, उपनिषद, रामायण, महाभारत इत्यादि अनेकों धर्मग्रंथ हैं जिनका आप रेफ्रेंस ले सकते हो | काम वासना को एक विकृति मानते हुए भी हम हिंदू हैं तथा खजुराहो की मैथुनरत मूर्तियां भगवान के मंदिरों में प्रतिष्ठित करके व शिवलिंग की पूजा करके भी हम हिंदू धर्म की गौरवशाली परंपरा को ही प्रतिपादित करते हैं, अश्वमेध को हमने पवित्र यज्ञ माना है साथ ही साथ अहिंसा परमो धर्मः का हम प्रतिनिधित्व करते हैं | इतने विरोधाभास का होना हमारे धर्म की एक महान ताकत है और इसका कारण है अपने धर्म के प्रति संदेह करने की हमें खुली छूट है | संदेह की इसी अग्नी से निकल कर जो विश्वास पैदा होता है उसमे सत्य की सुगंध होती है |
यही कारण है कि हिदू धर्म में सत्य की खोज के लिए तपस्वी, विद्वान, साधक अपने अपने तरीकों से साधना करके अपने नए रास्ते खोजते हैं जो कालांतर में नए प्रकार के धर्म की उत्पत्ति का कारण बनते हैं | महावीर स्वामी, गौतम बुद्ध, गुरु नानक देव, संत कबीर, इत्यादि अनेकों महापुरुषों ने हिंदू धर्म की इसी स्वतन्त्रता के आँचल में अपने प्रयोग किये तथा प्रचलित मान्यताओं का खंडन करके अपने नए रास्ते व मान्यताएं बनायीं व नए धर्मो का सूत्रपात किया |
उपरोक्त धारणा को मद्दे नज़र रखते हुए में अपनी बात के मुख्य बिन्दु पर आता हूँ कि महान चित्रकार एम एफ हुसैन एक कलाकार हैं | कलाकार की सोच सभी सीमाओं से परे होती है | एक ऐसे प्रख्यात कलाकार जिसको पश्चिम ने भी Pikaso of East कहा है, उसको हम सीमाओं में बाँधना चाहते हैं, क्यों? यदि किसी हिंदू ने हमारे देवी देवताओं की आपत्ति जनक तस्वीर बनायीं होती तो हम क्या कर लेते ? हमारे धर्मग्रन्थ गवाह हैं कि हमारे ऋषि मुनियों को भी धर्म से हटकर कुछ भी करने की पूर्ण स्वतन्त्रता थी | यहाँ तक कि ब्राहमणों द्वारा गोमांस खाने तक के उदाहरण हमें हमारे ही धर्मग्रंथों में मिल जायेंगे | इसी स्वतन्त्रता के कारण वे धर्म से ऊपर उठ कर सोच पाते थे व नए प्रयोग कर पाते थे | एक आम आदमी को इतनी स्वतन्त्रता देना व्यवस्था के लिए घातक होता है अतः यह स्वतन्त्रता केवल ऋषियों मुनियों तक ही सीमित थी | यहाँ हम बात एक आम आदमी की नहीं कर रहे बल्कि विश्व प्रसिद्ध कलाकार ऋषि मकबूल फ़िदा हुसैन की कर रहे हैं जिनको भारत सरकार ने पद्मश्री, पद्मभूषण, पद्मविभूषण जैसे कई पुरस्कारों से नवाजा है | ये लोग आम आदमी की सोच की सीमाओं से परे होते हैं | एम एफ हुसैन से अधिकाँश लोगों को ये शिकायत है कि वे क्यों नहीं अपने धर्म के लोगों की इस तरह की पेंटिंग्स बनाते ? में कहूँगा कि हिंदू धर्म समस्त विश्व में एक मात्र धर्म है जहां वे ऐसा कर सकते हैं | अन्य कोई धर्म इसकी इजाजत नहीं देता | ये हमारी कमजोरी नहीं ताकत है | हमारा अपमान नहीं बल्कि सम्मान है कि एक गैर हिंदू कलाकार को अपनी कल्पना को साकार रूप देने के लिए हमारे धर्म को अपना केनवास बनाना पड़ा | यदि अपमान है तो यह उनके अपने धर्म का अपमान है जो इसकी इजाजत नहीं देता |
यदि उन्होंने दुर्गा की नग्न पेंटिंग बना ली तो इसमें इतना बवाल मचाने वालों से मेरा एक सवाल है, कि माँ दुर्गा जो शक्ति स्वरूपा है जिनको हमने अनादि अनंता माना है वे कपड़ों के आविष्कार से पहले क्या अस्तित्व में ही नहीं थी ? इतनी छोटी सोच हम रखते हैं हमारे अपने देवी देवताओं के बारे में ? जिस किसी ने भी हमारे देवी देवताओं की पोशाकों का निर्धारण किया था वो भी तो कोई कलाकार, कोई कवि, कोई महान कल्पनाशील महापुरुष ही रहा होगा जो निश्चित तोर पर कपड़ों के आविष्कार होने के पश्चात ही पैदा हुआ होगा | यदि हम इस मान्यता से चलें तो जिसने इन देवी देवताओं को कपडे पहली बार पहनाए उसने भी प्रचलित मान्यताओं का खंडन किया था अतः वो भी एम एफ हुसैन के बराबर का अपराधी है |
मेरे ख़याल से तो एम एफ हुसैन ने हमारे धर्म के ओरिजिनल स्वरुप को ध्यान में रखकर तथा इसकी महान परम्पराओं से प्रेरणा लेकर यदि अपनी महान कल्पना से एक पेंटिंग बनायीं है जो उनकी आँखों से देखें तो इतनी पवित्र है कि कपडे या कोई अन्य आवरण उसको मैला ही कर सकता है | यदि हमारे तथाकथित धार्मिक ठेकेदारों के पास वो आँख ही नहीं बची तो इसमें बैचारे कलाकार का क्या दोष है | एक महान कलाकार अपनी कृति में ही अपना भगवान देखता है | यदि एम एफ हुसैन जैसे कलाकार को इस कल्पना में कोई विकृति नज़र आती, तो वो इसे एक पेंटिंग के रूप में अपनी कृति कभी नहीं बनाता |
हमारे महान धर्म के इन तथाकथित ठेकेदारों को एक प्रसिद्द शेर अर्ज करना चाहूँगा :
यूनान मिस्र रोम सब मिट गए जहां से |
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी ||
हमारी विविधता, संदेह की स्वतन्त्रता, लोकतांत्रिक सोच ही वो बात है जिसने हमें हज़ारों सदियों के इतने आक्रमण, इतने अतिक्रमण, इतने संक्रमण होने के बावजूद बचाए रखा है | अगर यह हस्ती मिटेगी तो इसके जिम्मेदार ये लोग ही होंगे जो इसके मूल पर चोट कर रहे हैं तथा इसको भी एक चरम पंथी धर्म की श्रेणी में लाने को अपना कर्त्तव्य समझ रहे हैं | एम एफ हुसैन जैसे महान कल्पनाशील चित्रकार को इतना प्रताडित करना कि वे देश छोडकर जाने को मजबूर हो गए, यह हमारे सभी के मुह पर एक तमाचा है |
आईये सब मिलकर इस महान धर्म को अपने वैज्ञानिक स्वरुप में सम्पूर्ण स्वीकार करने का प्रण लें तथा इन चरम पंथियों से इसे मुक्त करने की दिशा में सार्थक पहल करें |
Dear ThirdEye,
ReplyDeleteGreat post. I agree with you at 100% and frankly speaking, I always used to think otherwise and had a very negative image about M.F.Hussain. You changed it completely and at same time made me feel proud of my religion.