July 14, 2010

तमसो मा ज्योतिर्गमयः

तमसो मा ज्योतिर्गमयः
अर्थात हे प्रभु मुझे अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाओ

अत्यन्त सुन्दर ख़याल है किन्तु में यहाँ थोड़ा असहमत हूँ| में क्यों अपने आपको अन्धकार में ही देखूं| यदि में कहूं कि, है प्रभु मुझ पर अपना प्रकाश करो, तो क्या चाह कर भी अन्धकार वहाँ ठहर पायेगा ? मेरे लिए अन्धकार का कोई अस्तित्व ही नहीं है| यह केवल प्रकाश कि अनुपस्थिति को हम एक नाम दे देते हैं| यदि किसी कमरे में अन्धकार है, तो हम किसी भी यन्त्र से उसे बाहर नहीं निकाल सकते| कोशिश भी करेंगे तो जो शेष रहेगा वो भी अन्धकार ही होगा| अन्धकार को बाहर निकालने का कोई उपाय नहीं है, सिवाय इसके कि प्रकाश को लाया जाये| एक छोटा सा दीपक कमरे में लाकर देखो और चुनोती दो अन्धकार को कि है हिम्मत तो रुक कर दिखाए| यदि अन्धकार का अस्तित्व होता तो हम उसे जरूर बाहर निकाल पाते बिना किसी प्रकाश को लाये|

कितना अच्छा होता यदि अन्धकार शब्द हमारे शब्दकोष में होता ही नहीं| तब हमें "कमरे में अन्धकार है" की जगह पर कहना पड़ता कि "कमरे में प्रकाश नहीं है"| तब शायद हम प्रकाश को लाने का उपाय करते न की अन्धकार को भगाने का|

पूरी दुनिया अन्धकार को भगाने के ही उपाय करती है, प्रकाश को लाने का सरल उपाय कोई नहीं सुझाता| यदि में दुनिया की सारी बुराइयों को अन्धकार से निरुपित करू, तो पाउँगा कि जैसे अंधकार का कोई अस्तित्व नहीं है, वैसे ही बुराई का भी कोई अस्तित्व नहीं है| वो केवल अच्छाई की अनुपस्थिति मात्र है| जिस प्रकार प्रकाश की उपस्थिति में अन्धकार स्वतः विलीन हो जाता है, उसी तरह अच्छाई कि उपस्थिति में बुराई स्वतः विलीन हो जाती है| किन्तु इसका प्रयोग कोई करता ही नहीं है|

सभी नेता चीख चीख कर कहते हैं भ्रष्टाचार को मिटाओ, मगर कोई नहीं कहता कि शिष्टाचार को लाओ| सब कहते हैं गरीबी हटाओ, मगर कोई नहीं कहता कि अमीरी लाओ| सब अनैतिक कार्यों का विरोध करते हैं, परन्तु नैतिक कार्यों को कोई नहीं पूछता| यदि हम थोड़ी देर के लिए भ्रष्टाचार को भूल जाएँ, गरीबी को अपनी जगह रहने दें तथा अनैतिक कार्यों को भी होने दें अर्थात अन्धकार को भूल जायें और सिर्फ इतना भर करें कि इन सभी चीज़ों के साथ साथ शिष्टाचार लाएं, अमीरी लाएं, नेतिकता लाएं अर्थात प्रकाश लायें और फिर देखें कि कैसे इनके समक्ष अन्धकार के सामान ही भ्रष्टाचार, गरीबी, अनैतिकता आदि नकारात्मक चीज़ें विलीन होती है|

आज़ादी के बाद हमने अपराध रोकने के लिए पुलिस को बढाने का काम किया| ये ठीक वैसे ही है जैसे में लाठी लेकर कमरे से अन्धकार को बाहर निकालने कि कोशिश करूँ| केवल पुलिस की लाठी से अपराध नहीं रुक सकते इसके लिए चाहिए सकारात्मक ऊर्जा, एक प्रकाश, एक अच्छी प्रेरणा, धर्म आज धर्म जो इस कार्य को बखूबी निभा सकता था उसको भुला कर हमने छद्म धर्मनिरपेक्षता का लबादा ओढ़ लिया है|

आईये अपने देश को खूबसूरत बनाने की दिशा में एक नयी पहल करें, तथा अन्धकार को भगाने वाली निरर्थक योजनाओं को व नारों को नकार कर, प्रकाश को लाने की ओर कदम बढायें| शिष्टाचार लायें, अमीरी लायें, खुशहाली लायें, प्रगति लायें, नैतिकता लायें, धर्म को पुनर्स्थापित करें, बाकी प्रकृति पर छोड़ दें|

है प्रभु मेरे देश पर अपना प्रकाश फैला

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